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क्या आप भी अभिनंदन की तरह बनना चाहते हैं वायुसेना के फाइटर पायलट तो जानिए क्या करना पड़ेगा

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New Delhi : जाबांज अभिनंदन ड्यूटी पर लौट चुके हैं। उन्होंने पाकिस्तान में घुसकर पाकिस्तानी F-16 को मार गिराया। आज हम आपको बता रहे हैं कि अगर आप अभिनंदन की तरह बनना चाहते हैं वायुसेना के फाइटर पायलट तो आपको क्या क्या करना पड़ेगा।

भारतीय वायु सेना एक ऐसी संस्था है जो युवाओं को देश की सेवा करने का एक सुनहरा अवसर मुहैया कराती है। ये हजारों युवाओं के सपनों को साकार करने में भी अहम भूमिका निभाती है। बचपन में बच्चों का सबसे बड़ा सपना होता है कि वह हवा में उड़े, हवाई जहाज का सफर करें और उससे भी ज्यादा वह फाइटर पायलट बने।

भारतीय वायु सेना तीन स्तरों पर पायलटों का चुनाव करती है। इसमें से सबसे पहले स्तर में युवाओं को महज 17 साल की उम्र में ही इस प्रक्रिया में सम्मिलित होने का मौका दिया जाता है। इसके लिए बच्चों को साल में दो बार आयोजित होने वाले नेशनल डिफेंस अकादमी (एनडीए) की परीक्षाओं में सम्मिलित होना पड़ता है। परीक्षा पास कर लेने के बाद उन्हें ट्रेनिंग के लिए बुलाया जाता है। एनडीए में ट्रेनिंग के दौरान ही उन्हें स्नातक की उपाधि दी जाती है और यहां उनके पायलट बनने का पहला चरण पूरा हो जाता है।

वायु सेना यूपीएसी के माध्यम से एक अन्य परीक्षा का भी आयोजन करती है। इसे सीडीएस के नाम से जाना जाता है। इसके लिए इंटरमीडिएट में भौतिक और गणित के अलावा प्रथम श्रेणी से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य होता है। सीडीएस के अलावा वायु सेना एयरफोर्स कॉमन एडमिशन टेस्ट (एफकैट) का आयोजन भी कराती है जिसके माध्यम से भी पायलट बनने का सपना पूरा किया जा सकता है।

वायु सेना एनसीसी के कैडेट्स के लिए भी एक स्पेशल एंट्री प्रोग्राम का संचालन करती है। इसके लिए एनसीसी के एयर विंग से ‘सी’ प्रमाणपत्र हासिल करना अनिवार्य होता है। इसके अलावा डीजी एनसीसी के माध्यम से अप्लाई किया जा सकता है।

ऐसे पूरा होता है चयन का दूसरा चरण :   दूसरे चरण को सर्विस सेलेक्शन बोर्ड (एसएसबी) परीक्षा प्रक्रिया के नाम से जाना जाता है। इसके लिए पहले चरण का पास करना अनिवार्य होता है। दूसरे चरण के लिए चयनित होने पर अगली प्रक्रिया के लिए देश में स्थित सेलेक्शन बोर्ड्स में बुलाया जाता है। ये बोर्ड वाराणसी, देहरादून, मैसूर, गांधीगर और कंचरापारा में स्थित है। इन बोर्ड में युवाओं के एक अधिकारी बनने की काबिलियत की जांच होती है। इसके लिए युवाओं को कई तरह के परीक्षणों से होकर गुजरना पड़ता है।

इस प्रक्रिया के दौरान युवाओं में ऑफिसर बनने की काबिलियत के अलावा उनके पायलट एप्टीट्यूट टेस्ट की भी जांच की जाती है। इसके बाद ग्रुप टेस्ट भी किया जाता है। यह प्रक्रिया पूरे हफ्ते चलती है और प्रत्येक दिन चयनित छात्रों को ही अगले दिन के परीक्षा में शामिल होने का मौका दिया जाता है। बाकि को वापस घर भेज दिया जाता है।

एसएसबी टेस्ट पास करने के बाद चयनित छात्रों को चिकित्सकीय जांच के लिए बुलाया जाता है और इस जांच के ही आधार पर ही ऑल इंडिया मेरिट लिस्ट तैयार की जाती है। इसमें सफल छात्रों को पायलट ट्रेनिंग के लिए एयर फोर्स अकादमी (एएफए) डुंडीगुल बुलाया जाता है और यहीं पर पायलट बनने की प्रक्रिया की शुरुआत होती है।

फिर शुरू होती है कठिन ट्रेनिंग : एएफए में आने के बाद फ्लाइंग ब्रांच के ट्रेनिंग की शुरुआत होती है। यहां पर युवाओं को फाइटर पायलट बनने के लिए तीन श्रेणियों से होकर गुजरना पड़ता है। हर स्तर में पायलट बनने की प्रक्रिया जटिल होती जाती है। इन प्रक्रियाओं के दौरान उन्हें प्लेन उड़ाने से लेकर उसके हर पहलू से अवगत कराया जाता है। साथ में पढ़ाई भी जरूरी होती है।

पहला चरण : फाइटर पायलट बनने के लिए होने वाले पहले चरण की प्रक्रिया में छह महीने का वक्त लगता है। इस दौरान कैडेट को जहाज के बारे में बेसिक जानकारी दी जाती है। इस अवधि में उन्हें 55 घंटे की फ्लाइंग एक्सपीरिएंस भी कराई जाती है। प्रारंभिक ट्रेनिंग के लिए कैडेट को स्विस मेड बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट पिलाटस पीसी-7 को उड़ाने का मौका मिलता है। इस दौरान उन्हें फ्लाइंग के नए गुर सिखाए जाते हैं।

दूसरा चरण : पहले चरण में सफल छात्रों को दूसरे चरण की ट्रेनिंग के लिए आगे भेजा जाता है। यह ट्रेनिंग भी छह महीने की होती है लेकिन इसमें उड़ान के घंटे, विमान के बारे में जानकारियां और विमान तीनों बदल जाते हैं।

इसे इंटरमीडिएट ट्रेनिंग भी कहा जाता है। इसमें पायलट को कम से कम 87 घंटों का उड़ान अनुभव होना अनिवार्य होता है। साथ ही उन्हें हवाई जहाज में मैन्यूवर्स की ट्रेनिंग भी दी जाती है। इसमें कैडेट जहाज से हवा में कलाबाजी करना सिखता है। उनकी यह ट्रेनिंग किरण मार्क-II विमानों में होती है। इस विमान में उन्हें आधुनिक तकनीकों के साथ कई जरूरी चीजों को जानने का मौका मिलता है।

बहुत महत्वपूर्ण होता है तीसरा चरण : किसी भी फाइटर पायलट के लिए यह चरण सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। तीसरे और अंतिम चरण की ट्रेनिंग अवधि 12 महीनों की होती है और साथ में उड़ान के घंटे भी बढ़ जाते हैं।

अंतिम प्रक्रिया में पायलटों को हॉक जहाजों में ट्रेनिंग दी जाती है। यह जहाज एडवांस ट्रेनिंग जेट है जिसमें युद्ध के समय इस्तेमाल की जाने वाले हर वो तकनीक मौजूद होते हैं जिसकी पायलटों को जरूरत होती है।

इस प्रक्रिया में महीने दर महीने पायलटों की ट्रेनिंग और जटिल होती जाती है। इस दौरान पायलटों को मिग, जगुआर, तेजस, मिराज जैसे सुपरसोनिक विमानों की ट्रेनिंग दी जाती है। इस तरह मिलता है एक नया पायलट : अंतिम चरण पास होने के साथ ही पायलटों को लाइसेंस दिया जाता है और देश को एक नया फाइटर पायलट मिलता है। इस चरण के समाप्ति के बाद पायलटों को उनके देश के विभिन्न स्क्वाड्रनों में तैनात कर दिया जाता है।

फाइटर पायलट बनाने की इस पूरी प्रक्रिया में एक पायलट के पीछे एयर फोर्स करीब 13 से 15 करोड़ रुपए खर्च करती है। यह रकम इतनी ज्यादा होती है कि एक सामान्य आदमी अपने पूरी जिंदगी में इतने पैसे नहीं कमा पाएगा।

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अगर आपके पास है 25 पैसे का ये गैंडे वाला सिक्का तो आपको मिलेंगे तीन लाख

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New Delhi : आन्ध्रप्रदेश राज्य में सिक्के की दुकान लगाने वाले व्यापारी ने कुछ सिक्के संग्रहित किए हैं। 25 पैसे का गैंडे वाला ये सिक्का उन्होंने तीन लाख रूपये में बेचा है।

यदि आपके पास भी तरह के सिक्के हैं तो उन्हें आप भी ऑनलाइन शॉप पर बेच सकते हैं। India Mart जैसी वेबसाइट पर ऐसे सिक्के आसानी से बेचे जा सकते हैं।

पाई, अधेला और दुअन्नी, एक पैसा, दो पैसे, पांच पैसे, दस पैसे और 20 पैसे के बाद अब चवन्नी भी आज से इतिहास में समा गई। चवन्नी धातु का एक सिक्का मात्र नहीं थी बल्कि हमारे इतिहास का एक ऐसा गवाह भी थी जिसने वक्त के न जाने कितने उतार चढ़ाव देखे।

सन् 1919, 1920 और 1921 में जार्ज पंचम के समय खास चवन्नी बनाई गई थी. इसका स्वरूप पारंपरिक गोल न रखते हुए अष्ट भुजाकार रखा गया था। यह चवन्नी निकल धातु से तैयार हुई थी लेकिन यह खास आकार लोगों को लुभा नहीं पाया। इतिहासकारों की मानें तो यह पहली ऐसी चवन्नी थी जिसका आकार गोल नहीं था।

मशीन से बनी चवन्नी पहली बार 1835 में चलन में आई उसे ईस्ट इंडिया कंपनी के विलियम चतुर्थ के नाम पर जारी किया गया था। तब यह चांदी की हुआ करती थी। पुराने सिक्कों के संग्रह का शौक रखने वाले 67 वर्षीय बुजुर्ग श्रीभगवान ने बताया कि 1940 तक आयी चवन्नियां पूरी तरह चांदी की रहीं लेकिन इसके बाद मिलावट का दौर शुरू हुआ और 1942 से 1945 के बीच आधी चांदी की चवन्नी बाजार में उतारी गई। लेकिन उसके बाद 1946 से निकल की चवन्नी चलन में आई। निकल की चवन्नी के एक तरफ जार्ज षष्टम और दूसरी ओर इंडियन टाइगर का चित्र बना हुआ था।

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दिवाली पर नकली मावे से जरा बचके…ऐसे करें असली नकली मावे की पहचान

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New Delhi : दिवाली के बाद भइया दूज का त्योहार आ रहा है। त्योहार के इस सीजन में मिठाइयों की सबसे ज्यादा खरीदारी होती है। कई लोग तो मावा या खोया घर लाकर उससे तरह-तरह के मिष्ठान घर में ही बनाते हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं बाजार में मिलने वाला खोया मिलावटी या नकली हो सकता है। आए दिन इससे जुड़ी तमाम खबरें भी हम पढ़ते-देखते हैं। अगर आप भी त्योहार के इस सीजन में नकली मावे की सही परख करना चाहते हैं खरीदने से पहले इन 7 बातों को जरूर ध्यान रखें।

मावा असली है या नकली? त्योहार के सीजन में खरीदते समय ऐसे परखें
खोए के जरा से टुकड़े को हाथ के अंगूठे पर थोड़ी देर के लिए रगड़ें। इसमें मौजूद घी की महक अगर देर तक अंगूठे पर टिकी रही तो समझ लीजिए मावा एकदम शुद्ध है।

हथेली पर मावे की एक गोली बनाएं और उसे देर तक दोनों हथेलियों के बीच घूमाते रहें। अगर ये गोली फटने लगे तो समझिए मावा नकली है। 3.5 मिलीलीटर गर्म पानी में करीब 3 ग्राम खोया डालें। थोड़ी देर ठंडा होने के बाद इसमें आयोडीन सोलूशन डालें। आप देखेंगे कि नकली खोए का रंग धीरे-धीरे नीला पड़ने लगेगा।

अगर चाहें तो खाकर भी असली-नकली मावे को पहचान कर सकते हैं। अगर मावे में चिपचिपाहट महसूस हो रही है तो समझ जाइए कि वो खराब हो चुका है। असली मावा खाने पर कच्चे दूध जैसे स्वाद आएगा।

पानी में मावा डालकर फेंटने पर अगर वह छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटता है तो ये उसके खराब होने के संकेत हैं। दो दिन से ज्यादा पुराना मावा खरीदने से बचें।

कच्चे मावे की बजाय अगर आप सिंका हुआ मावा खरीदें तो बेहतर होगा। इससे बनी मिठाई का स्वाद भी ज्यादा बेहतर होगा और इसके जल्दी खराब होने की संभावना भी कम होती है।

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लिवर खराब होने से 3 महीने पहले शरीर देता है ये 5 संकेत, इन्हें पहचाने वरना चली जाएगी आपकी जान

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New Delhi : : लिवर शरीर का सबसे महत्‍वपूर्ण और बड़ा अंग होता है। यदि इसमें किसी भी प्रकार का इंफेक्‍शन या खराबी आ जाती है तो, शरीर में कई प्रकार के लक्षण दिखाई देने शुरू हो जाते हैं। हमारे देश में बहुत से लोग हैं जिन्‍हें लिवर की समस्‍या है किन्‍तु उनका इलाज ठीक से नहीं हो पाता। लिवर की बीमारी ज्‍यादातर उन्‍हीं को होती है जो मोटे होते हैं या फिर शराब का सेवन अधिक करते हैं।

आज के जमाने में लिवर का रोग अब बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गया है बल्‍कि यह अब कम उम्र के लोगों में भी होने लगा है। ये बहुत ही कम लोग जानते हैं कि लिवर जब 80% तक डैमेज हो चुका होता है तब जा कर इसके लक्षण दिखाई देने शुरू होते हैं। यदिआप इन लक्षणों को सही समय पर पहचान लेगें तो आप अपनी जान बचा सकते हैं। आइये जानते हैं जब लिवर खराब होता है तो शरीर में क्‍या क्‍या लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

1. आंखों में पीलापन आना : लिवर खराब होने के लक्षण में सबसे पहले आंखों, त्‍वचा और नाखूनों का रंग पीला पड़ने लगता है। यही नहीं इसके साथ पेशाब का रंग भी पीला हो जाता है। यह बाइल जूस के अत्‍यधिक प्रोडक्‍शन की वजह से होता है। 2. मितली आना : यदि लिवर को तकलीफ होती है तो इंसान को बार बार मितली आने जैसा लगता है। कई केसों में उल्‍टी के साथ खून के थक्‍के भी दिखाई देते हैं।

3. पेट के निचले हिस्‍से में सूजन आना : यदि आपके पेट के निचले हिस्‍से में सूजन आती हुई दिखाई दे रही है तो यह लिवर में खराबी होने का संकेत हो सकता है। यह सूजन लिवर के लगातार काम बढ़ जाने की वजह से होता है। इस कंडीशन को कभी अनदेखा ना करें और तुरंत डॉक्‍टर को दिखाएं। 4. नींद ना आना : लिवर अगर खराब होने लगता है तो रोगी को नींद आना कम होजी है। हो दिनभर थका हुआ दिखाई देता है और सुस्‍त नजर आता है।

5. बुखार आना : लिवर की खराबी की वजह से रोगी को बुखार आता है और उसके मुंह का स्‍वाद बिगड़ जाता है। यही नहीं उसके मुंह से बदबू भी आने लगती है। 6. भूख न लगना : इस दौरान रोगी को भूख नहीं लगती और उसके पेट में गैस और एसिडिटी की समस्‍या बनने लगती है। यही नहीं इससे उसके सीने में जलन और भारीपन की भी शिकायत बढ़ जाती है।

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