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तुर्की की राजधानी में तय्यब एर्दोगान को लगा तगड़ा झटका, पूर्ण मतदान के बाद हारे चुनाव, अब होगा…

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नई दिल्ली: दुनिया भर के देशों में अपनी तीखी बयानबाजी और हमदर्दी को लेकर पहचान बना चुके तरकी के राष्ट्रपति तैयब एर्दोगान के लिए बुरी खबर आ रही है टर्की के अंदर अपनी लोकप्रियता का लोहा मनवा चुके राष्ट्रपति तैयब एर्दोगान को इस बार तगड़ा झटका लगा है जिससे दुनियाभर में हलचल मच गई है टर्की के अंदर जनता ने बदलाव का मूड बना लिया है जिसको देखते हुए लगातार तैयब एर्दोगान की पार्टी को हार का सामना करना पड़ रहा है।

हाल ही में तैयब एर्दोगान की पार्टी को लोकल चुनाव में भी हार का सामना करना पड़ा था जिसके बाद लगातार पार्टी में विशेष बदलाव किए गए थे आपको बता देता या फिर तुकांत सिर्फ टर्की में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में मुस्लिम नेता के तौर पर अपनी पहचान बना चुके हैं।

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तय्यब एर्दोगान को राजधानी इस्तांबुल के मेयर पद के लिये होरहे चुनाव में तगड़ा झटका लगा है,क्योंकि उनके प्रत्याशी को एक बार फिर हार का सामना करना पड़ा है।

सेक्युलर रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) के उम्मीदवार इकरम इमामोग्लू ने 53.86 प्रतिशत मत लिये तथा सत्ताधारी पक्ष के प्रत्याशी बिनाली येल्दीरम को मात्र 45.23 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं।25 साल में यह लगातार दूसरा मौका है जब तुर्की के सबसे बड़े शहर इस्तांबुल पर राष्ट्रपति रजब तय्यब एर्दोगान और उनकी पार्टी को नियंत्रण खोना पड़ा है।

सत्ताधारी एके पार्टी के उम्मीदवार बिनाली युल्दरम (63) ने इकरम इमामोग्लू को जीत की बधाई देते हुए शहर की बेहतरी के लिए काम करने की आशा जताई है. उन्होंने कहा कि तुर्की में लोकतंत्र को कोई खतरा नहीं है।

इस्तांबुल के एक करोड़ से ज्यादा मतदाताओं ने मेयर पद के लिए वोटिंग की है. मार्च में हुए मेयर पद के लिए चुनाव में विपक्षी सीएचपी पार्टी के उम्मीदवार इकरम इमामोग्लू को आश्चर्यजनक रूप से जीत मिली थी. हालांकि तुर्की चुनाव बोर्ड ने अनियमितता को आधार बनाकर इस चुनाव को रद्द कर दिया था. जिसके बाद दोबारा चुनाव करवाया गया. सत्ताधारी एकेपी पार्टी ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया था।

इस्तांबुल तुर्की की आर्थिक और सांस्कृतिक राजधानी है. यहां पर डेढ़ करोड़ लोग रहते हैं. यह तुर्की की जीडीपी में 31 फीसदी योगदान देता है. खुद रैचप तैय्यप एर्दोआन मानते हैं कि जो इस्तांबुल जीतेगा वही तुर्की की सत्ता में आएगा. एर्दोआन ने भी साल 1994 में तुर्की के मेयर के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी।

इमामोग्लू इस बार ‘लोकतंत्र की लड़ाई’ लड़ रहे थे और चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में उन्हें दूसरी बार भी पूर्व प्रधानमंत्री बिनाली युल्दरम से आगे हुए दिखाया गया था।

बिनाली युल्दरम (63) एर्दोआन की एके पार्टी के संस्थापक भी हैं. युल्दरम साल 2016 से 2018 के बीच तुर्की के प्रधानमंत्री रह चुके हैं. राष्ट्रपति प्रणाली आने के बाद उन्होंने पद छोड़ दिया था. वह परिवहन और संचार मंत्री रह चुके हैं. उन्हें फरवरी में नई संसद के लिए स्पीकर चुना गया था।

युल्दरम के लिए दोबारा चुनाव करवाने को न्यायसंगत ठहराने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा. शहर की संरचना के विकास का उनका चुनावी मुद्दा जनता को पसंद नहीं आया।

इमामोग्लू ने शहरी गरीबी को इस चुनाव में मुद्दा बनाया. उन्होंने सार्वजनिक ठेके से सत्तासीन पार्टी के समर्थकों को फायदा देने का आरोप लगाया है।

जोखिमों का विश्लेषण करने वाली फर्म टेनेको इंटेलिजेंस के वोल्फ पिकोली कहते हैं कि दूसरी बार मिली हार रैचप तैय्यप एर्दोआन के लिए बड़ी मानहानि की बात होगी. वह आगे कहते हैं कि 20 साल बाद पहली बार एर्दोआन को इमामोग्लू के रूप में राजनैतिक चुनौती मिली है।

एसोसिएट प्रेस के मुताबिक पूरे शहर में दोनों नेताओं के पोस्टर लगे हैं और रोज बड़ी रैलियों का आयोजन किया गया. मतदान के खत्म होने के बाद स्थानीय मीडिया कवरेज पर लगी रोक को खत्म कर दिया गया है।

पिछली बार इकरम इमामोग्लू ने 13,000 वोट से चुनाव जीता था. तब उन्होंने तुर्की की सत्तासीन एके पार्टी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था।

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इन दो मुस्लि’म सांसदों से “डरा” इज़राइल?, आनन-फानन में उ’ठाया ये क़’दम

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तेल अवीव: इज़राइल के ऊपर लम्बे समय से इस तरह के आ’रोप लगते रहे हैं कि वो फ़िलिस्तीन के लोगों को परे’शान करता है और उनकी ज़मीनों पर क़’ब्ज़ा कर रहा है. जो भी इज़राइल के ख़ि’लाफ़ बोलता है, बौ’खलाहट में इज़राइल कोई न कोई ऐसा क़दम उठाता है जिसे द’मन के किसी रूप में शामिल किया जा सकता है. कुछ इसी तरह की ख़बर आ रही है.

असल में इज़राइल ने कहा है कि वह दो अमेरिकी महि’ला सांसदों की नियोजित यात्रा पर रो’क लगाएगा। इसका कारण ये है कि ये दोनों म’हिला सांसद फ़िलिस्तीन के ह’क़ में बोलती हैं. इन सांसदों ने इज़राइल के बायकाट का समर्थन किया है क्यूंकि फिलिस्तीनियों के साथ इज़राइल के व्यव’हार में कोई परिवर्तन नहीं आया है. ऐसा कहा जा रहा है कि इजराइल ने ये फ़ै’सला अमरीका से प्रेरित होकर लिया है.

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दोनों सांसद इल्हान उमर और राशिदा तलैब के खिला’फ ये बड़ा फै’सला लिया है। उनका कहना है कि इनका लक्ष्य केवल इस्राइल को नुक’सान पहुंचाना और उसके खि’लाफ उक’सावे में वृ’द्धि करना है। एक अखबार में छपी ख़बर के मुताबिक़ अमरीकी राजनीतिज्ञ इजराइल के इस फ़ै’सले को ग़’लत बता रहे हैं और कह रहे हैं कि इस पर पु’नर्विचार करना चाहिए.

इसपर उमर का कहना है कि ये लोकतांत्रिक मूल्यों का अ’पमान है। उमर और तलैब जो फलस्तीनी मू’ल के हैं, यात्रा करने के लिए वीकेंड पर इस्राइल आने वाले थे। इस्राइल के फै’सले की घोषणा से पहले, वेस्ट बैंक के क’ब्जे वाले भाग में स्थित तलेब के पारिवारिक गांव बीट उर अल-फूक में लोग उनकी योज’नाबद्ध यात्रा के लिए उत्सुक थे।

तलैब की 85 वर्षीय दादी मुफ्तिया तलैब ने तो अपनी पोती और अन्य कांग्रेसविमेन के आने की खुशी में पार्टी की तैयारियां तक कर रखी थीं। इस्राइल के अधिकारियों ने कहा कि वह तलैब को उनके परिवार से मिलवाने के लिए अलग से मा’नवीय अनुरोध पर विचार करेंगे, जिसके लिए उन्हें इस्राइल से गुजरना होगा। इस्राइल ने अपने फैस’ले की घोषणा ट्रंप के डेमोक्रेटिक कांग्रेसविमेन पर रोक लगाने की बात के बाद की है।

इस मामले पर डोनाल्ड ट्रंप ने ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी,”अगर इस्राइल ने सांसद उमर और तलैब के यात्रा की इजाजत दे दी तो इससे उसकी बड़ी कमजोरी दिखेगी।” उन्होंने आगे लिखा, “वे इस्राइल और सभी यहूदी लोगों से नफरत करते हैं, और ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे उनके दिमाग को बदला जा सके….वे एक अप’मान हैं।”’

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अमरीका की इन दो मुस्लि’म सांसदों से “डरा” इज़राइल?, आनन-फानन में उ’ठाया ये क़’दम

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तेल अवीव: इज़राइल के ऊपर लम्बे समय से इस तरह के आ’रोप लगते रहे हैं कि वो फ़िलिस्तीन के लोगों को परे’शान करता है और उनकी ज़मीनों पर क़’ब्ज़ा कर रहा है. जो भी इज़राइल के ख़ि’लाफ़ बोलता है, बौ’खलाहट में इज़राइल कोई न कोई ऐसा क़दम उठाता है जिसे द’मन के किसी रूप में शामिल किया जा सकता है. कुछ इसी तरह की ख़बर आ रही है.

असल में इज़राइल ने कहा है कि वह दो अमेरिकी महि’ला सांसदों की नियोजित यात्रा पर रो’क लगाएगा। इसका कारण ये है कि ये दोनों म’हिला सांसद फ़िलिस्तीन के ह’क़ में बोलती हैं. इन सांसदों ने इज़राइल के बायकाट का समर्थन किया है क्यूंकि फिलिस्तीनियों के साथ इज़राइल के व्यव’हार में कोई परिवर्तन नहीं आया है. ऐसा कहा जा रहा है कि इजराइल ने ये फ़ै’सला अमरीका से प्रेरित होकर लिया है.

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दोनों सांसद इल्हान उमर और राशिदा तलैब के खिला’फ ये बड़ा फै’सला लिया है। उनका कहना है कि इनका लक्ष्य केवल इस्राइल को नुक’सान पहुंचाना और उसके खि’लाफ उक’सावे में वृ’द्धि करना है। एक अखबार में छपी ख़बर के मुताबिक़ अमरीकी राजनीतिज्ञ इजराइल के इस फ़ै’सले को ग़’लत बता रहे हैं और कह रहे हैं कि इस पर पु’नर्विचार करना चाहिए.

इसपर उमर का कहना है कि ये लोकतांत्रिक मूल्यों का अ’पमान है। उमर और तलैब जो फलस्तीनी मू’ल के हैं, यात्रा करने के लिए वीकेंड पर इस्राइल आने वाले थे। इस्राइल के फै’सले की घोषणा से पहले, वेस्ट बैंक के क’ब्जे वाले भाग में स्थित तलेब के पारिवारिक गांव बीट उर अल-फूक में लोग उनकी योज’नाबद्ध यात्रा के लिए उत्सुक थे।

तलैब की 85 वर्षीय दादी मुफ्तिया तलैब ने तो अपनी पोती और अन्य कांग्रेसविमेन के आने की खुशी में पार्टी की तैयारियां तक कर रखी थीं। इस्राइल के अधिकारियों ने कहा कि वह तलैब को उनके परिवार से मिलवाने के लिए अलग से मा’नवीय अनुरोध पर विचार करेंगे, जिसके लिए उन्हें इस्राइल से गुजरना होगा। इस्राइल ने अपने फैस’ले की घोषणा ट्रंप के डेमोक्रेटिक कांग्रेसविमेन पर रोक लगाने की बात के बाद की है।

इस मामले पर डोनाल्ड ट्रंप ने ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी,”अगर इस्राइल ने सांसद उमर और तलैब के यात्रा की इजाजत दे दी तो इससे उसकी बड़ी कमजोरी दिखेगी।” उन्होंने आगे लिखा, “वे इस्राइल और सभी यहूदी लोगों से नफरत करते हैं, और ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे उनके दिमाग को बदला जा सके….वे एक अप’मान हैं।”’

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राजस्थान और यूपी के लिए राज्यसभा उपचुनाव की तारीख घोषित

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उत्तरप्रदेश और राजस्थान में होने वाले राज्यसभा उपचुनाव की तारीख का ऐलान गुरुवार को हो गया। इन दोनों राज्यों मे राज्यसभा उपचुनाव की वोटिंग 26 अगस्त को होगी। इसी दिन दोनों सीटों के लिए काउंटिंग भी की जाएगा। दोनों राज्यों में एक -एक सीट पर राज्यसभा के उपचुनाव होने हैं। गौरतलब है कि बुधवार को कांग्रेस नेता और गांधी परिवार के करीबियों में गिने जाने वाले संजय सिंह बीजेपी में शामिल हो गए थे।

संजय सिंह ने मंगलवार को कांग्रेस और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। गौरतलब है कि संजय सिंह पहले भी बीजेपी में रहे हैं और उसके टिकट पर लोकसभा सदस्य चुने गए थे। माना जा रहा है कि संजय सिंह को बीजेपी से यूपी में अपना उम्मीदवार बना सकती है।

संजय सिंह ने हाल में संपन्न लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की सुल्तानपुर लोकसभा सीट से मेनका गांधी के खिलाफ कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था और उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

इससे पहले जुलाई में जरात में राज्यसभा की 2 सीटों पर शुक्रवार को हुए उपचुनाव में बीजेपी ने जीत हासिल की। दोनों सीटों पर अलग-अलग हुए मतदान में विदेश मंत्री एस जयशंकर और ओबीसी नेता जुगलजी ठाकोर को जीत मिली थी। कांग्रेस की और से दो विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की थी। कांग्रेस की ओर से अल्पेश ठाकोर और झाला ने क्रॉस वोटिंग करने के बाद पार्टी और विधायकी से इस्तीफा दे दिया था।

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