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राष्ट्रीय उलमा काउंसिल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना रशादी मदनी ट्रिपल तलाक को लेकर….

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आज माननीय सुप्रीम_कोर्ट ने ट्रिपल_तलाक़ पे बने असंवैधानिक क़ानून के खिलाफ हमारी #याचिका को क़ुबूल कर लिया है और केंद्र सरकार को नोटिस कर इस पर जवाब मांगा है। हमने अपनी याचिका में साफ कहा है कि मुस्लिम विवाह एक सिविल कॉन्ट्रैक्ट है जिसे सरकार क्रिमिनल बना रही जो कि अवैध है साथ ही इस्लाम मे ही दो अन्य मसलक ऐसे हैं

जो कि एक बार मे दिए गए 3 तलाक़ को एक तलाक़ ही मानते हैं तो इस मसले का हल हमारे यहां खुद ही है साथ जब माननीय कोर्ट ने खुद 3 तलाक़ को अवैध करार दे दिया तो जब तलाक़ हुआ ही नही तो सज़ा किस बात की? ऐसे में इस कानून का औचित्य ही बाकी नही रह जाता।

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आजम खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ा झटका, कोर्ट ने 27……

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रामपुर से समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 27 मामलों में दर्ज एफआईआर को रद्द किए जाने की अर्जी पर सुनवाई से इनकार कर दिया है।

दरअसल, हाईकोर्ट ने आज़म खान के वकीलों ने अदालत के आदेश का पालन करते हुए जल्द ही 27 अर्जी दाखिल करने की बात कही है। साथ ही कोर्ट ने सुनवाई टालते हुए 29 अगस्त की तारीख तय की है।

दूसरी और जल निगम में हुई भर्ती प्रक्रिया में धांधली की जांच में एसआईटी तेजी लाने जा रही है। एसआईटी का लक्ष्य अगले महीने के मध्य तक जांच पूरी करने का है। सूत्रों का कहना है कि एसआईटी को इंतजार अप्टेक के उन कंप्यूटरों की फॉरेंसिक रिपोर्ट का है, जिसे जांच के लिए हैदराबाद भेजा गया था।

यह रिपोर्ट आजम की मुश्किलें बढ़ा सकती हैं। एसआईटी के अधिकारी उम्मीद कर रहे हैं कि अगले एक सप्ताह में हैदराबाद से फॉरेंसिक रिपोर्ट मिल जाएगी और फिर जांच में तेजी लाई जाएगी।

इस मामले में पूर्व नगर विकास मंत्री के अलावा नगर विकास सचिव रहे एसपी सिंह से एसआईटी लंबी पूछताछ कर चुकी है। सूत्रों का कहना है कि एसआईटी ने इस मामले में अधिकतर सुबूत इकट्ठा कर रखे हैं। फॉरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद जांच को आगे बढ़ाया जाएगा।

मालूम हो कि सपा के शासनकाल में 2016 के अंत में हुई जल निगम में 1300 पदों पर वैकेंसी निकली थी। इसमें 122 सहायक अभियंता, 853 अवर अभियंता, 335 नैतिक लिपिक और 32 आशुलिपिक की भर्ती हुई थी।

जल निगम विभाग के ही कुछ अधिकारियों ने इस संबंध में धांधली की शिकायत की थी जिसके बाद जांच शुरू हुई। सरकार इस मामले में 122 सहायक अभियंताओं को पहले ही बर्खास्त कर चुकी है।

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रोहिंग्या मुसलमानों का म्यांमार जाने से इंकार, बांग्लादेश ने पांच बसों और 10 ट्रकों….

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बांग्लादेश में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों ने वापस म्यांमार जाने से इंकार कर दिया हैं। रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस भेजने के लिए गुरुवार को पांच बसें और दस ट्रक बांग्लादेश के टेकनाफ शरणार्थी शिविर पहुंचे। लेकिन कोई भी रोहिंग्या मुसलमान सवार नहीं हुआ।

साल 2017 में सैन्य कार्रवाई के चलते म्यामां से भागने वाले मुसलमान अल्पसंख्यक समुदाय के 740,000 लोग अपनी सुरक्षा की गारंटी मिले बिना वापस लौटने से इनकार कर रहे हैं। साथ ही वह यह वादा किए जाने की मांग कर रहे हैं कि म्यामां उन्हें नागरिकता देगा।

रोहिंग्या नेता नोसिमा ने एक बयान में कहा, ‘‘म्यामां सरकार ने हमारा बलात्कार किया और हमारी हत्या की इसलिए हमें सुरक्षा की जरूरत है। बिना सुरक्षा के हम कभी वापस नहीं जाएंगे।’’ दक्षिण पूर्व बांग्लादेश में एक शिविर के रोहिंग्या सदस्य मोहम्मद इस्लाम ने कहा, ‘‘हमें नागरिकता, सुरक्षा की असली गारंटी और मूल जन्म स्थान का वादा चाहिए। इसलिए हमें स्वदेश भेजे जाने से पहले म्यामां सरकार से बात करनी होगी।’’

3,450 रोहिंग्याओं के पहले बैच को ले जाने के लिए मुहैया कराए गए वाहन टेकनाफ में शिविर में सुबह नौ बजे पहुंचे गए। लेकिन छह घंटे से भी अधिक समय बीतने के बाद कोई नहीं आया और वाहन खाली लौट गए। अधिकारियों ने बताया कि वे शुक्रवार को लौटेंगे। बांग्लादेश के शरणार्थी आयुक्त मोहम्मद अबुल कलाम ने पत्रकारों से कहा, ‘‘हमने 295 परिवारों का साक्षात्कार किया लेकिन किसी ने भी अभी स्वदेश लौटने की इच्छा नहीं जतायी है।’’ उन्होंने बताया कि अधिकारी परिवारों से इस बाबत पूछते रहेंगे।

रोहिंग्या विस्थापन मुद्दे पर नजर रख रहे संयुक्त राष्ट्र (UN) ने बुधवार को कहा था कि शरणार्थियों की वापसी उनकी इच्छा से होनी चाहिए। बता दें कि पिछले दिनों बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर रोहिंग्या मुस्लिमों को वापस उनके देश म्यांमार भेजने के मामले में जापान ने बांग्लादेश और म्यांमार के बीच मध्यस्थता की पेशकश की थी। जापान के विदेश मंत्री तारा कोनो और बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमिन के बीच हुई बैठक के दौरान यह पेशकश की गई थी।

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अयोध्या विवाद: निर्मोही अखाड़ा को बड़ा झटका, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – आप तो जमीन का मालिकाना हक….

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अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जमीन के मालिकाना हक को लेकर केस में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू संस्था ‘निर्मोही अखाड़ा से कहा कि अगर वे भगवान राम लला का ‘शबैत (उपासक) होने का दावा करते हैं तो वे विवादित संपत्ति पर मालिकाना हक खो देंगे।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने 2010 के फैसले में अयोध्या में 2.77 एकड़ की विवादित जमीन को तीन पक्षों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच बराबर-बराबर बांटने को कहा था। अखाड़ा ने अनंतकाल से विवादित स्थल पर भगवान ‘राम लला विराजमान का एकमात्र आधिकारिक ‘शबैत’ होने का दावा करते हुए कहा था कि वह वहां पर पूजा के लिये ‘पुरोहित’ नियुक्त करता रहा है।

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा, “जिस क्षण आप कहते हैं कि आप ‘शबैत’ (राम लला का भक्त)हैं, आपका (अखाड़ा) संपत्ति पर मालिकाना हक नहीं रह जाता है।” पीठ में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर भी शामिल हैं. न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने एकमात्र उपासक के तौर पर अखाड़ा की प्रकृति में भेद करते हुए कहा कि उसका विवादित जमीन पर मालिकाना हक नहीं रह जाता है। उन्होंने अखाड़ा के वकील सुशील कुमार जैन से कहा, “आपका संपत्ति पर एक तिहाई का दावा सीधे चला जाता है।”

उन्होंने जैन से पूछा कि आपने कैसे सवालों के घेरे में आई संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा किया। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, “नहीं, मेरा अधिकार समाप्त नहीं होता है. ‘शबैत’ होने के नाते संपत्ति पर मेरा कब्जा रहा है।” हिंदू संस्था के दावे को सही ठहराते हुए उन्होंने कहा कि यद्यपि देवता को न्यायिक व्यक्ति बताया गया है, ‘शबैत’ को देवता की तरफ से मुकदमा करने का कानूनी अधिकार प्राप्त है। ‘राम लला’ के वकील से उल्टा रुख अपनाते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता जैन ने कहा, “मूर्तियों को पक्षकार नहीं बनाया जाना चाहिये था।” पीठ ने पूछा, ‘क्या आप ‘शबैत’ होने के नाते संपत्ति पर कब्जे का दावा कर रहे हैं।”

वकील ने इसका सकारात्मक जवाब दिया। उन्होंने कहा, “मेरे शबैत होने की अर्जी पर किसी ने भी आपत्ति नहीं जताई है।” उन्होंने कहा, “सारी पूजा अखाड़ा द्वारा नियुक्त ‘पुजारी’ करा रहे हैं। जहां तक ‘शबैत’ के रूप में मेरे अधिकार का सवाल है तो उसपर कोई विवाद नहीं है।” अखाड़े ने उस विवादित स्थल पर अपना दावा पेश किया जहां बाबरी मस्जिद को छह दिसंबर 1992 को गिरा दिया गया था। अखाड़ा ने कहा कि मुसलमानों को वहां 1934 से घुसने और नमाज अदा करने की अनुमति नहीं दी गई है।

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