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देश की पहली नेत्रहीन IAS हैं प्रांजिल पाटिल, इन्होंने बिन आंखों के सपने देखे और उन्हें पूरा भी किया

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New Delhi :  अगर आपके हौंसले बुलंद हो तो कोई भी वजह आपको कामयाब होने से नहीं रोक सकती। इस बात को सच साबित किया है देश की पहली दिव्‍यांग आईएएस अधिकारी प्रांजल पाटिल ने।

जिन्होंने अपनी मंजिल हासिल करने के लिये आंखों की रोशनी ना होने के बाद भी अपने जीवन को उजाला कर दिया। जी हां हम बात कर रहे ऐसी महिला की जिन्होने अपनी शारीरिक कमजोरी को हिम्मत बनाकर 2017 में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 124 वीं रैंक हासिल करके केरल की एरनाकुलम की नई उप कलेक्‍टर का पद हासिल कर दिखाया है। आज प्रांजल पाटिल, केरल कैडर की अब तक की पहली नेत्रहीन महिला आईएएस अधिकारी हैं। जिनकी इस प्रेरणा को हम सभी सलाम करते है। प्रांजल की ये उपलब्धि देश के अन्‍य दिव्‍यांगों के ल‍िए किसी प्रेरणा से कम नहीं है।

नेत्रहीन महिला प्रांजल ने अपने इस मुकाम को हासिल करने के लिये कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन हार ना मानकर अपनी मंजिल को पाकर दिखा दिया कि हौसले बुलंद हों तो सभी मंजिलों को पाया जा सकता है।

बताया जाता है कि प्रांजल की आखें बचपन से ही नही गई थी। उनकी आखों के अंधेरे का कारण बनी स्कूल में हुई एक दुर्घटना । जब वह मात्र छह साल की थीं जब उनके साथ पढ़ रही एक सहपाठी ने उनकी एक आंख में पेंसिल मारकर उन्हें घायल कर दिया था। इसके बाद प्रांजल की उस आंख की दृष्टि खो गयी। अभी एक आखों से अपने भविष्य के सपने संजो ही रही थीं कि उनकी दूसरी आंखों की रोशनी भी धीरे धीरे जाने लगी। अब प्रांजल के जीवन में मानों अधेरा सा छा गया। लेकिन उनके माता-पिता ने कभी भी उनकी नेत्रहीनता को उनकी शिक्षा के बीच आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिये प्रांजल को मुंबई के दादर में नेत्रहीनों के लिए (श्रीमती कमला मेहता)स्कूल में भेजा। प्रांजल की कड़ी मेहनत ने 10वीं और 12वीं की परीक्षा में काफी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की।

पहली सीढ़ी शिक्षा की सीढ़ी पार करने के बाद जीवन की कठिनाई से गुजरने का दौर तब आया, जब लोगों ने उन्हे आभास कराया कि वो नेत्रहीनता के कारण नौकरी के लायक नहीं हैं यह बात साल 2016 की है जब उन्होनें संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 733वीं रैंक हासिल किया था और इसके बाद भारतीय रेलवे लेखा सेवा (आईआरएएस) में नौकरी आवंटित की गई थी। ट्रेनिंग के दौरान रेलवे मंत्रालय ने प्रांजल की सौ फीसदी नेत्रहीनता की कमी का आधार बताकर उन्हें नौकरी देने से इनकार कर दिया। इसके बाद भी उन्होने हार नही मानी। और 2017 के यूपीएससी परीक्षा में 124वीं रैंक हासिल करके एरनाकुलम की नई उप कलेक्‍टर बनकर यह बता दिया कि उसकी शारीरिक कमजोरी किसी की मोहताज नहीं है।

प्रांजल का मानना है कि कठिनाइयां हर किसी के जीवन में आती है। पर उससे घबरायें नहीं, बल्कि उसका सामना करें। सफलता मिलने में समय लग सकता है, लेकिन हमें इस बीच हार नहीं माननी चाहिए। सही उपलब्धता ही असल चुनौती है, व्यक्ति जब खुद से हार जाता है, तो वो दिव्यांग न होते हुए भी दिव्यांग हो जाता है.’

प्रांजल का कहना है कि धैर्य रखना ही सबसे बड़ी प‍रीक्षा है। शादी के बाद प्रांजल का अनमोल सहारा बन कर आये उनके पति एलबी पाटिल ..जिन्होने शादी के पहले ही एक ही शर्त रखी थी कि वह पढ़ाई नहीं छोड़ेंगी। प्रांजल का कहना है कि उनकी कामयाबी के पीछे उनके माता पिता के अलावा उनके पति का बड़ा योगदान है, जिन्होंने हर कदम पर उनका सहयोग दिया।

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ऑटो में छूट गए थे हार्ट पेशेंट बूढी मां के 4 लाख रुपए, ऑटो ड्राइवर ने घर आकर लौटाए

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New Delhi : हाल ही में गुजरात के अहमदाबाद आईं राजस्‍थान के जोधपुर की रहने वाली हार्ट पेशंट प्रेमलता गहलोत के 4 लाख रुपए एक ऑटो रिक्‍शा में छूट गया। जिंदगीभर की बचत गंवा देने पर प्रेमलता के होश उड़ गए लेकिन थोड़ी ही देर बाद उनके खुशी का ठिकाना नहीं रहा। ऑटो रिक्‍शा चालक नंजी नयी उनके पास पहुंचे और सारा पैसा लौटा दिया।

इस पैसे से प्रेमलता अपने हार्ट का ऑपरेशन कराने वाली थीं। इससे पहले प्रेमलता और उनके पति धर्मनारायण मंगलवार सुबह रानिप एसटी बस डिपो पहुंचे। यहां से उन्‍होंने एक निजी अस्‍पताल के लिए ऑटो रिक्‍शा लिया। इस बुजुर्ग दंपती ने नंजी को थलतेज के किसी सस्‍ते होटेल ले चलने के लिए कहा। थलतेज के नजदीक दोनों लोग नाश्‍ते के लिए उतरे।

इसके बाद वे अपने होटेल चले गए। इस बीच प्रेमलता अपना पैसों से भरा बैग होटेल में ही भूल गईं। प्रेमलता कहती हैं, ‘जब मुझे बैग की याद आई तो दिल बैठ गया। हम ड्राइवर की तलाश में आसपास गए और बाद में वस्‍तरपुर पुलिस स्‍टेशन पहुंचे।’ उधर, नयी जब अपने ऑटो रिक्‍शा की सफाई कर रहे थे, तब उन्‍होंने बैग देखा।’

नंजी ने बताया कि उन्‍होंने कभी इतना कैश नहीं देखा था, इसलिए उनका दिल धड़कने लगा। इसके बाद नंजी को याद आया कि बुजुर्ग दंपती का यह पैसा हो सकता है। नंजी अपने बेटे और दामाद के साथ वस्‍तरपुर पुलिस स्‍टेशन पहुंचे जहां बुजुर्ग दंपती पैसे मिलने की आस में बैठे हुए थे। नंजी ने उनका पैसा लौटा दिया।

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तुम्हारे भाई का केस कोर्ट में आ जाए तो क्या करोगी.किसान की बेटी ने दिया ऐसा जवाब कि जज बन गई

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New Delhi : जीवन आपकी कोर्ट में रिश्तेदार या परिचित का केस आए तो क्या करेंगी? जवाब था-दूसरी कोर्ट में ट्रांसफर कर दूंगी या खुद केस से हट जाऊंगी। मप्र हाईकोर्ट की सिविल जज की परीक्षा में बैठने वाली किसान की बेटी किरण मलिक के इस जवाब ने उन्हें जज बना दिया।

जी हां पिछली 12 जनवरी को सिविल जज की परीक्षा का रिजल्ट आया और किसान की बेटी किरण मलिक उसमें पास कर गईं। हम आज आपको उनकी कहानी बता रहे हैं। पिता किसान, खेती से करते हैं पालन-पोषण : सिविल जज के लिए चुनी गईं किरण मलिक के पिता सतीश मलिक किसान हैं। सिंगोली में जमीन है उसी पर खेती कर होने वाली इनकम से परिवार का पालन-पोषण करते हैं। किरण बताती हैं उन्होंने 10वीं तक की शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर और हायर सेकंडरी कन्या हायर सेकंडरी स्कूल सिंगोली में कंप्लीट किया। 10वीं बोर्ड के बाद ही देश की सेवा का लक्ष्य बनाया।

पुलिस से रिटायर दादा से मिली प्रेरणा, 5 घंटे रोज पढ़ी : किरण कहती हैं देश सेवा की बात सुनकर मेरे दादा रिटायर हेड कांस्टेबल नवाबसिंह मलिक ने प्रशासनिक सेवा में जाने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद जज बनने की ठानी। 12वीं के बाद नीमच कॉलेज में बीए और ज्ञान मंदिर लॉ कॉलेज से एलएलबी की। एलएलबी फाइनल वर्ष से ही कोचिंग लेना शुरू कर दी। मई 2017 में एलएलबी पास करने के बाद सिविल जज की तैयारी में जुट गईं। रोज पांच घंटे पढ़ाई के लिए निर्धारित किए। तैयारी के लिए कई किताबें पढ़ीं और इस मुकाम को हासिल किया।

पति और ससुर बैंक मैनेजर : किरण की शादी नवंबर 2015 में मोरवन निवासी अमृतराम जाट के सुपुत्र महिपाल सिंह से हुई थी। अमृतराम बैंक आफ इंडिया खलघाट की शाखा के मैनेजर हैं। जबकि पति महिपाल भी झाबुआ ग्रामीण बैंक में मैनेजर पद पर हैं। पति और ससुर दोनों ने किरण का हमेशा हौसला बढ़ाया। पढ़ाई के दौरान किरण के सामने कई परेशानियां भी आईं पर हिम्मत नहीं हारी। सिविल जज में चयन के बाद किरण के सिंगोली आने पर परिवार और नगरवासियों ने बस स्टैंड पर ढोल-नगाड़ों से स्वागत किया और जुलूस के साथ घर ले गए। जहां लोगों ने बधाई दी।

इन सवालों के दिए जवाब : एलएलबी के बाद किरण ने इंदौर-जबलपुर में कोचिंग लेकर सिविल जज एग्जाम की तैयारी की। 29 सितंबर 2018 को प्री एग्जाम दिया और मप्र हाईकोर्ट की 24 व 25 नवंबर को मुख्य परीक्षा में बैठीं। इसमें किरण ने सफलता प्राप्त की। 6 जनवरी को जबलपुर में हाईकोर्ट के जज सुजॉय पाल और मंदिरा दुबे ने साक्षात्कार लिया। उनका पहला सवाल था जज क्यों बनना चाहती हो? किरण ने जवाब दिया- बचपन में देश सेवा के लिए इसी क्षेत्र में आने का सपना देखा था। दूसरा सवाल की अगर आपकी कोर्ट में ऐसा केस आ जाए जिसमें की आरोपी आपका भाई, रिश्तेदार या परिचित हो तो आप कैसे उस केस को हल करेगी? किरण बोलीं- या तो उस केस को दूसरी कोर्ट में ट्रांसफर कर देगी या खुद ही उस केस से अलग हो जाएंगी। इन जवाबों से दोनों जज प्रभावित हुए और 12 जनवरी को साक्षात्कार का परिणाम आया। इसमें किरण सिविल न्यायाधीश वर्ग 2 बन चुकी थीं।

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संतों का ऐलान : अयोध्या के बाद अब काशी मथुरा को कराएंगे मुक्त

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New Delhi : संतों के शीर्ष निकाय अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद (ABAP) ने अयोध्या मुद्दे का समाधान होने के बाद काशी और मथुरा के मंदिरों की मुक्ति के लिए अभियान तेज करने की घोषणा की है।

न्यूज एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक ABAP के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने गुरुवार को कहा, ‘मस्जिदों के निर्माण के लिए काशी और मथुरा में मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया। हम इस मुद्दे को उठाएंगे और सुनिश्चित करेंगे कि इन स्थानों पर भव्य मंदिर बनाए जाएं। केंद्र और राज्य में हिंदू सरकारें हैं और इसके लिए इससे बेहतर समय नहीं हो सकता है।’

महंत ने कहा कि काशी और मथुरा को मुक्त करने की मांग काफी समय से की जा रही है। उन्होंने कहा, ‘हमें विश्वास है कि अयोध्या में अदालत का फैसला राम मंदिर के पक्ष में होगा। मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों के व्यवहार में हताशा साफ तौर पर देखी गई थी।’

ABAP प्रमुख ने मुसलमानों से राष्ट्र हित में काशी और मथुरा पर अपने दावे छोड़ने को कहा। उन्होंने कहा, ‘मुस्लिमों को इन दो स्थानों पर भव्य मंदिरों के निर्माण का समर्थन करना चाहिए।’ वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर में ज्ञानवापी मस्जिद द्वारा आंशिक रूप से अतिक्रमण किया गया है। इस स्थान पर स्थित मूल काशी विश्वनाथ मंदिर को नष्ट करके औरंगजेब द्वारा 1669 में मस्जिद का निर्माण किया गया था।

हिंदू संगठन लंबे समय से मौजूदा काशी विश्वनाथ मंदिर के भव्य जीर्णोद्धार और मस्जिद के स्थानांतरण के लिए कहते रहे हैं। इसके साथ ही मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि से सटी शाही ईदगाह भी लंबे समय से रडार पर है।

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